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झाला मन्ना का इतिहास, Jhala-Manna History In Hindi.

झाला मन्ना – वैसे तो राजस्थान का इतिहास बड़े-बड़े योद्धाओं से भरा पड़ा है लेकिन झाला मानसिंह का त्याग और बलिदान वास्तव में अदभुद था। उनकी स्वामिभक्ति और वीरता ने उनको इतिहास में अमर कर दिया। झाला मन्ना का सम्बन्ध बड़ीसादड़ी से था जिन्हें सादड़ी जागीर मिली।

झाला मन्ना की बहिन चम्पाबाई झाला का विवाह महाराणा प्रताप के साथ हुआ था.

इस लेख में हम पढ़ेंगे कि झाला मन्ना कौन था? क्या झाला मन्ना और झाला बीदा एक ही हैं?

झाला मन्ना का इतिहास (Jhala Manna History In Hindi)

पूरा नामझाला मानसिंह (Jhala Mansingh).
अन्य नामझाला बीदा या झाला मन्ना.
जन्म15 मई 1542 ईस्वी.
पिता का नामराजराणा सुरताण सिंह.
माता का नामरानी सेमकंवर जी.
बहिनचम्पाबाई झाला.
कहाँ के वंशजहलवद के मकवाना राजपूत (गुजरात).
पूर्वजझाला अज्जा जी (महाराणा सांगा के साथ खानवा का युद्ध लड़ा).
झाला अज्जा के साथ रिश्ताझाला अज्जा जी के पौत्र.
मृत्युजून, 1576 (हल्दीघाटी).
(Jhala Manna History In Hindi)

झाला मन्ना बड़ी सादड़ी (चितौड़गढ़) के राजपूत परिवार से थे। झाला मन्ना का पूरा नाम झाला मानसिंह था। श्री अज्जा और श्री सज्जा जो कि झाला मानसिंह के पूर्वज थे, उनको बड़ी सादड़ी जागीर विरासत में मिली थी जो कि मेवाड़ के महाराणा रायमल ने उनको तोहफ़े के रूप में प्रदान की थी।

झाला मन्ना को ही झाला बीदा के नाम से भी जाना जाता हैं. झाला मानसिंह (झाला बीदा) के कारण ही हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप को घायल होने के बाद युद्ध के मैदान से बाहर निकलने में सफलता मिली थी, जिसका जिक्र इस लेख में हम आगे करेंगे। महाराणा प्रताप पर आए संकट को दूर करने के लिए झाला बीदा अथवा झाला मन्ना का बलिदान अद्वितीय हैं.

जब-जब महाराणा प्रताप का जिक्र किया जाता हैं तब-तब झाला मानसिंह (झाला मन्ना) को भी याद किया जाता हैं.

हल्दीघाटी युद्ध में झाला मन्ना का योगदान

जून, 1576 ईस्वी में महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बिच हुए ल्दीघाटी युद्ध से कुछ समय पहले ही झाला मानसिंह महाराणा प्रताप की सेना में शामिल हुए थे। मुग़ल सेना और महाराणा प्रताप की सेना के बीच हल्दी घाटी में भयंकर युद्ध छिड़ गया था। झाला मन्ना को मेवाड़ की सेना के बाएं भाग का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मिली थी.

कद काठी में महाराणा प्रताप जैसे ही दिखाई देने वाले झाला मन्ना ज्यादातर समय महाराणा प्रताप के आस पास ही लड़ाई लड़ रहे थे। अकबर की विशाल सेना में 50 हजार से अधिक सैनिक थे और हाथी भी बहुत थे. ऐसा कहते हैं अकबर की सेना बड़ी थी लेकिन प्रताप का कलेजा बड़ा था. प्रताप की सेना में 15 हजार के करीब सैनिक थे.

हाथियों की संख्या कम होने के कारण महाराणा प्रताप ने चेतक (महाराणा प्रताप का घोड़ा) को हाथी का मुखौटा पहना दिया ताकि अकबर की सेना में शामिल हाथी भ्रमित हो जाए. मेवाड़ी सेना में हकीम खां सूरी के नेतृत्व में मुग़ल सेना पर जोरदार धावा बोल दिया।

भयंकर आक्रमण को देखकर मुग़ल सेना घबराकर युद्द भूमि से पीछे हट गई, लेकिन प्रताप की सेना ने पीछा किया। रक्ततलाई नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ. अकबर की सेना का सेनापति जयपुर का मानसिंह था. महाराणा प्रताप मानसिंह के हाथी पर जा चढ़ा और तलवार से जोरदार वार किया जिसमें मानसिंह बाल-बाल बच गया. लेकिन मानसिंह के हाथी की सूंड में लगी तलवार से महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक की टाँग कट गई.

जब प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा चेतक घायल हो गया, तो मुगल सेना ने उनको चारो तरफ से घेर लिया। जब झाला मन्ना की नज़र महाराणा प्रताप की तरफ़ पड़ी तो वो युद्ध करते हुए उनके पास पहुंच गए। महाराणा प्रताप को संकट में देखकर उन्होंने एक युक्ति अपनाई, उन्होंने राज तिलक और महाराणा प्रताप का मुकुट धारण कर लिया और पूर्व दिशा में चल पड़े।

जिस बहादुरी के साथ झाला मानसिंह दुश्मनों पर प्रहार कर रहे थे चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था। प्रताप का मुकुट धारण कर वो मुगल सेना पर काल की तरह टूट पड़े , मुगलों ने उनको महाराणा प्रताप समझ लिया और पूरी सेना उनके पीछे लग गई।

बहुत ही वीरता और शौर्य के साथ लड़ाई करते हुए झाला मानसिंह वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन इसी सूझबूझ और चातुर्यता के चलते महाराणा प्रताप सुरक्षित चेतक के साथ युद्ध भूमि से बाहर निकलने में कामयाब हुए.

तब तक महाराणा प्रताप युद्ध स्थल से काफ़ी दूर निकल चुके थे। झाला मन्ना ने मेवाड़ के भविष्य के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए और हमेशा के लिए अमर हो गए, झाला मन्ना (झाला बीदा) के साथ इस युद्ध में रामशाह तोमर भी वीरगति को प्राप्त हुए.

झाला मानसिंह की स्वामिभक्ति, बलिदान और सूझबूझ की वजह से महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को आजाद कराने में सफ़लता प्राप्त की।

झाला वंश का योगदान

झाला मन्ना के पूर्वज हमेशा मेवाड़ के लिए लड़ते रहे, झाला वंश का मेवाड़ के अद्वितीय योगदान निम्नलिखित हैं-

[1] 16 मार्च 1527 को खानवा के युद्ध में झाला अज्जाजी, राणा सांगा को बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।

[2] सन 1535 ईस्वी में बहादुर शाह के आक्रमण के समय अज्जाजी के बेटे सिंहाजी (सज्जा जी) ने बहादुरी का परिचय देते हुए मेवाड़ के लिए शहीद हुए थे.

[3] सन 1568 में जब अकबर ने चित्तौड़गढ़ (मेवाड़) पर आक्रमण किया तो अज्जाजी के पोते वीर सुरताण सिंह (झाला मन्ना के पिता) ने मुगलों से भीषण युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए.

[4] जून 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध में झाला मन्ना वीरगति को प्राप्त हुए.

झाला मन्ना के पूर्वजों ने मेवाड़ के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए इनका अविस्मरणीय योगदान युगों-युगों तक याद रखा जाएगा।

झाला-मन्ना के सम्बन्ध में पूछे जाने वाले प्रश्न-

[1] झाला-मन्ना का पूरा नाम क्या था?

उत्तर- झाला-मन्ना का पूरा नाम झाला मानसिंह था.

[2] मुग़ल झाला पर क्यों टूट पड़े?

उत्तर- झाला मानसिंह ने महाराणा प्रताप का कवच धारण किया था. मुग़ल राज चिन्हों से भ्रमित हो गए, इसलिए मुग़ल झाला पर टूट पड़े.

[3] झाला बीदा कौन था?

उत्तर- झाला मन्ना को ही झाला बीदा के नाम से जाना जाता हैं.

[4] झाला अज्ज़ा कौन था?

उत्तर- झाला अज्जा, झाला मन्ना के दादाजी के पिता थे.

[5] हल्दीघाटी के युद्ध में किसकी जीत हुई?

उत्तर- हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की जीत हुई, जीत के प्रमाण भी मौजूद हैं.

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